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महाजनस्य संसर्ग:
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मणिना वलयं
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माता शत्रु:
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मानवस्य महापापं
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मात्रा समं नास्ति
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मुक्ताफलं किं
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मुखं पद्मदलाकारं
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मूलं भुजङ्गै:
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मृगमीनसज्जनानां
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मेघा: सलिलभारेण
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मौखरं लाघवकरं
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यथा चित्तं तथा
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यस्य नास्ति स्वयं
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यस्यास्ति वित्त
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यथा काष्ठं च
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यस्तु सञ्चरते देशान्
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यथा परोपकारेषु
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यथा ह्येकेन चक्रेण
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या कुन्देदुतुषारहार
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येषां न विद्या
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यो न सञ्चरते देशान्
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योजनानां सहस्त्राणि
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य: पठति लिखति
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रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न
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राज्ञि राष्ट्रकृतं पापं
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राजपत्नी गुरो:
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रात्रिर्गमिष्यति
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रूपयौवनसंपन्ना
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लभेत सिकतासु
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लक्ष्मीर्वसति जिह्वाग्रे
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